दोस्तों, आजकल हर कोई फिट और स्वस्थ रहना चाहता है, है ना? लेकिन क्या आप भी स्ट्रेचिंग और रिहैबिलिटेशन एक्सरसाइज के बीच का अंतर नहीं समझ पाते, या सोचते हैं कि ये दोनों एक ही चीज़ हैं?
मुझे पता है, कई बार लोग इस बात को लेकर थोड़ा भ्रमित हो जाते हैं। मैंने खुद देखा है कि जब शरीर में कोई दर्द या हल्की-फुल्की चोट लगती है, तो लोग अक्सर ‘बस थोड़ी स्ट्रेचिंग कर लेता हूँ’ कहकर काम चला लेते हैं, जबकि ज़रूरत कुछ और ही होती है। आजकल की भागदौड़ भरी जिंदगी में, जहाँ हम डेस्क पर घंटों बिताते हैं या जिम में इंटेंस वर्कआउट करते हैं, हमारे शरीर को कब किस चीज़ की ज़रूरत है, ये जानना बेहद ज़रूरी हो गया है। सही जानकारी न होने पर, एक छोटी सी गलती आपकी रिकवरी को धीमा कर सकती है, या शायद चोट को और बढ़ा भी सकती है!
क्या आप जानते हैं कि गलत तरीके से की गई स्ट्रेचिंग या रिहैब, फायदे की जगह नुकसान भी कर सकती है? तो आखिर इन दोनों में क्या फ़र्क है और कब आपको कौन सा विकल्प चुनना चाहिए?
आइए, इस बारे में सटीक जानकारी प्राप्त करते हैं।
दोस्तों, जैसा कि मैंने पहले बताया, फिट रहने की हमारी इच्छा तो बहुत होती है, पर कभी-कभी सही जानकारी न होने की वजह से हम कुछ गलतियाँ कर बैठते हैं। मैंने खुद देखा है, जिम में लोग अक्सर बिना ठीक से वार्म-अप किए ही भारी वज़न उठाना शुरू कर देते हैं, या फिर किसी हल्की-फुल्की चोट पर सिर्फ़ ‘स्ट्रेचिंग’ करके ही काम चलाने की कोशिश करते हैं। पर क्या आपको पता है कि शरीर की हर ज़रूरत अलग होती है?
कब आपको सिर्फ़ अपनी मांसपेशियों को ढीला करना है और कब उन्हें सच में ठीक करने की ज़रूरत है, ये जानना बहुत ज़रूरी है। आइए, इन दोनों चीज़ों को थोड़ा करीब से समझते हैं।
शरीर को समझो: उसे कब क्या चाहिए?

मांसपेशियों का लचीलापन और स्ट्रेचिंग का रिश्ता
जब हम स्ट्रेचिंग की बात करते हैं, तो मेरे दिमाग में सबसे पहले लचीलापन (flexibility) आता है। सोचिए, हम कितनी देर एक ही जगह बैठे रहते हैं या एक ही तरह का काम करते रहते हैं। इससे हमारी मांसपेशियाँ अकड़ जाती हैं, छोटी हो जाती हैं। मुझे याद है, एक बार मैं लगातार 8 घंटे तक कंप्यूटर पर काम कर रहा था, और शाम होते-होते मेरी गर्दन और कंधे ऐसे जाम हो गए थे जैसे किसी ने पत्थर रख दिया हो!
उस वक़्त मुझे बस कुछ हल्की स्ट्रेचिंग की ज़रूरत थी ताकि रक्त संचार ठीक हो सके और मांसपेशियाँ थोड़ी खुल सकें। स्ट्रेचिंग का मुख्य उद्देश्य यही होता है – मांसपेशियों की लंबाई बढ़ाना, जोड़ों की गति को बेहतर करना और शरीर को ज़्यादा फुर्तीला बनाना। यह हमें रोज़मर्रा के कामों को आसानी से करने में मदद करती है, जैसे झुकना, उठना या पहुँचने वाले काम। एक तरह से यह हमारे शरीर को ‘तैयार’ करती है, चाहे वह कसरत के लिए हो या सिर्फ़ दिनभर की गतिविधियों के लिए। लेकिन हाँ, इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि यह किसी गहरी चोट को ठीक कर सकती है। यह तो बस शरीर को थोड़ा आराम और गति देती है।
दर्द की असली वजह और पुनर्वास की भूमिका
अब बात करते हैं पुनर्वास व्यायाम (rehabilitation exercise) की। यह स्ट्रेचिंग से बिल्कुल अलग है। जब कभी हमें कोई चोट लगती है – चाहे वो खेल के दौरान हो, कोई मोच आ जाए या सर्जरी के बाद हो – तब सिर्फ़ स्ट्रेचिंग से काम नहीं चलता। हमें एक विशेष प्रकार के व्यायाम की ज़रूरत होती है जो उस चोट को ठीक करे, उस हिस्से की ताकत वापस लाए और भविष्य में वैसी चोट लगने की संभावना को कम करे। मेरा एक दोस्त था, जिसने क्रिकेट खेलते हुए अपने घुटने में चोट लगवा ली थी। डॉक्टर ने उसे फिजियोथेरेपिस्ट के पास जाने की सलाह दी। वहाँ उसने सिर्फ़ स्ट्रेचिंग नहीं की, बल्कि कुछ ख़ास तरह के व्यायाम किए जो उसके घुटने की मांसपेशियों को मज़बूत कर रहे थे, जोड़ को सहारा दे रहे थे और धीरे-धीरे उसे फिर से दौड़ने-भागने के लायक बना रहे थे। ये व्यायाम बहुत सोच-समझकर, धीरे-धीरे और किसी विशेषज्ञ की देखरेख में किए जाते हैं। उनका लक्ष्य होता है कि चोटग्रस्त हिस्से की कार्यक्षमता को पूरी तरह से बहाल किया जाए और व्यक्ति अपनी सामान्य दिनचर्या में वापस लौट सके।
जब चोट बोले: स्ट्रेचिंग की सीमाएँ
कब स्ट्रेचिंग आपकी दोस्त नहीं
दोस्तों, कभी-कभी हमें लगता है कि स्ट्रेचिंग हर दर्द का इलाज है, पर ऐसा नहीं है। मेरा अनुभव कहता है कि अगर आपको कोई तेज़ या लगातार दर्द हो रहा है, या कोई पुरानी चोट है जो ठीक नहीं हो रही, तो स्ट्रेचिंग से ज़्यादा आपको किसी और चीज़ की ज़रूरत है। मैंने देखा है कि लोग अक्सर पीठ दर्द में कुछ भी खींचने लगते हैं, जिससे कई बार दर्द और बढ़ जाता है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि दर्द का कारण सिर्फ़ मांसपेशियों का अकड़ना नहीं होता। हो सकता है कि कोई नस दबी हो, कोई जोड़ अपनी जगह से थोड़ा हट गया हो, या कोई लिगामेंट खिंच गया हो। ऐसी स्थिति में, अगर आप बिना सोचे-समझे स्ट्रेचिंग करते हैं, तो हो सकता है कि आप उस हिस्से पर और दबाव डाल रहे हों और चोट को और गंभीर बना रहे हों। स्ट्रेचिंग केवल मांसपेशियों को लंबा करती है, यह अंदरूनी क्षति को ठीक नहीं करती। अगर आप दर्द में स्ट्रेचिंग करते हैं और दर्द बढ़ जाता है, तो तुरंत रुक जाएँ। यह एक साफ़ संकेत है कि आपका शरीर आपको कुछ और करने के लिए कह रहा है।
सही समय पर सही कदम: विशेषज्ञ की सलाह
जब दर्द या चोट की बात आती है, तो मैं हमेशा यही कहती हूँ कि किसी विशेषज्ञ की सलाह लेना सबसे अच्छा है। एक फिजियोथेरेपिस्ट या डॉक्टर आपको बता सकते हैं कि आपकी चोट की असली वजह क्या है और उसके लिए सबसे सही इलाज क्या है। मुझे याद है, एक बार मेरे टखने में मोच आ गई थी, और मैंने सोचा कि थोड़ी स्ट्रेचिंग कर लूँगी तो ठीक हो जाएगा। पर जब दर्द नहीं गया, तो मैं डॉक्टर के पास गई। उन्होंने मुझे कुछ विशिष्ट पुनर्वास व्यायाम बताए और कहा कि अभी स्ट्रेचिंग से बचें। धीरे-धीरे उन व्यायामों को करके ही मैं पूरी तरह ठीक हो पाई। यह मेरा व्यक्तिगत अनुभव है कि जब शरीर में कुछ गड़बड़ लगे, तो ‘खुद ही डॉक्टर’ बनने की कोशिश न करें। खासकर जब बात चोट से उबरने की हो, तो सही मार्गदर्शन बहुत ज़रूरी है। विशेषज्ञ न केवल आपको सही व्यायाम सिखाते हैं, बल्कि यह भी बताते हैं कि उन्हें कितनी बार और कितने वज़न के साथ करना है, जो कि बहुत महत्वपूर्ण है।
पुनर्वास व्यायाम: वापसी का रास्ता
ताकत और संतुलन की बहाली
पुनर्वास व्यायाम सिर्फ़ दर्द कम करने के लिए नहीं होते, बल्कि वे आपको अपनी पूरी ताकत और गतिशीलता वापस दिलाने के लिए डिज़ाइन किए जाते हैं। कल्पना कीजिए, अगर आपके घुटने में चोट लगी है, तो पुनर्वास व्यायाम केवल घुटने पर ही काम नहीं करेंगे, बल्कि वे आस-पास की मांसपेशियों, जैसे कि जांघ और कूल्हे की मांसपेशियों को भी मज़बूत करेंगे। ऐसा इसलिए क्योंकि हमारे शरीर के अंग एक-दूसरे से जुड़े होते हैं। मैंने देखा है कि जब लोग पूरी तरह से पुनर्वास नहीं करते, तो उन्हें बार-बार वही चोट लगने का खतरा बना रहता है। पुनर्वास व्यायामों में अक्सर ताकत बनाने वाले व्यायाम (strength training), संतुलन वाले व्यायाम (balance exercises) और गतिशीलता वाले व्यायाम (mobility exercises) शामिल होते हैं। ये सभी मिलकर चोटग्रस्त हिस्से को पहले से भी ज़्यादा मज़बूत बनाते हैं। ये धीरे-धीरे शुरू होते हैं और जैसे-जैसे आपका शरीर ठीक होता जाता है, इनकी तीव्रता बढ़ती जाती है। यह एक धीमा लेकिन सुनिश्चित रास्ता है जो आपको पूरी तरह से ठीक होने में मदद करता है।
चोट से बचाव का कवच
क्या आप जानते हैं कि पुनर्वास व्यायाम सिर्फ़ चोट को ठीक ही नहीं करते, बल्कि भविष्य में वैसी ही चोट लगने से भी बचाते हैं? यह एक तरह से आपके शरीर के लिए ‘सुरक्षा कवच’ का काम करते हैं। जब कोई चोट लगती है, तो अक्सर ऐसा इसलिए होता है क्योंकि शरीर का कोई हिस्सा कमज़ोर होता है या संतुलन में कमी होती है। पुनर्वास के दौरान, हम उन कमज़ोरियों को दूर करते हैं और पूरे शरीर को एक साथ काम करने के लिए प्रशिक्षित करते हैं। मेरा एक और दोस्त है जो फुटबॉल खेलता है। उसे बार-बार हैमस्ट्रिंग (जांघ के पीछे की मांसपेशी) में खिंचाव आ जाता था। फिजियोथेरेपिस्ट ने उसे कुछ ख़ास पुनर्वास व्यायाम दिए जो न सिर्फ़ उसकी हैमस्ट्रिंग को मज़बूत कर रहे थे, बल्कि उसकी कूल्हे की मांसपेशियों और कोर (पेट और पीठ की मांसपेशियाँ) को भी ताकत दे रहे थे। इन व्यायामों से उसकी मांसपेशियों में समन्वय बेहतर हुआ और अब उसे सालों से वैसी चोट नहीं लगी है। यह एक बेहतरीन उदाहरण है कि कैसे पुनर्वास व्यायाम केवल ठीक करने के बजाय, बचाव का भी काम करते हैं।
स्ट्रेचिंग बनाम पुनर्वास: मुख्य अंतर एक नज़र में
दोस्तों, इन दोनों के बीच के अंतर को समझना बहुत ज़रूरी है ताकि आप अपने शरीर का सही तरीके से ख्याल रख सकें। मैंने आपके लिए एक छोटी सी तालिका बनाई है, जो आपको इनके मुख्य फ़र्कों को समझने में मदद करेगी। इसे देखकर आपको पता चलेगा कि कब आपको सिर्फ़ हल्का खिंचाव चाहिए और कब आपको एक गंभीर उपचार की ज़रूरत है।
| विशेषता | स्ट्रेचिंग (खिंचाव) | पुनर्वास व्यायाम (रिहैब) |
|---|---|---|
| मुख्य उद्देश्य | मांसपेशियों का लचीलापन बढ़ाना, गतिशीलता सुधारना, रक्त संचार बढ़ाना, अकड़न दूर करना। | चोट से उबरना, कार्यक्षमता बहाल करना, दर्द कम करना, ताकत और संतुलन बढ़ाना, भविष्य की चोटों को रोकना। |
| कब करें | सामान्य शारीरिक गतिविधि से पहले/बाद, दिनभर की अकड़न दूर करने के लिए, तनाव कम करने के लिए। | चोट लगने के बाद, सर्जरी के बाद, किसी चिकित्सीय स्थिति के इलाज के रूप में, डॉक्टर या फिजियोथेरेपिस्ट की सलाह पर। |
| तरीका | मांसपेशियों को धीरे-धीरे खींचना और एक निश्चित समय तक बनाए रखना (स्टेटिक स्ट्रेच), या गतिशील (डायनामिक) तरीके से खींचना। | विशिष्ट, लक्षित व्यायाम जो चोटग्रस्त हिस्से को मज़बूत और स्थिर करते हैं। अक्सर नियंत्रित, प्रगतिशील और दोहराव वाले होते हैं। |
| विशेषज्ञ की आवश्यकता | अक्सर स्वयं किया जा सकता है, पर सही तकनीक जानना फायदेमंद होता है। | लगभग हमेशा किसी योग्य फिजियोथेरेपिस्ट या चिकित्सा पेशेवर की देखरेख और मार्गदर्शन की आवश्यकता होती है। |
| जोखिम | गलत तरीके से करने पर मांसपेशियों में हल्का खिंचाव या चोट लग सकती है। | गलत तरीके से करने पर चोट बढ़ सकती है, या ठीक होने में देरी हो सकती है। विशेषज्ञ की देखरेख में करना बेहद ज़रूरी है। |
सही चुनाव: अपने शरीर का सम्मान करो
गलतफ़हमी से बचें, सही को चुनें
अब जब हमने स्ट्रेचिंग और पुनर्वास व्यायामों के बीच के अंतर को इतनी गहराई से समझा है, तो मुझे लगता है कि आप भी इस बात से सहमत होंगे कि इन दोनों को एक ही समझना कितनी बड़ी गलती हो सकती है। यह ऐसा ही है जैसे आप प्यास लगने पर खाना खा लें या भूख लगने पर पानी पी लें!
दोनों ही स्थिति में आपकी ज़रूरत पूरी नहीं होगी। मेरा मानना है कि अपने शरीर की ज़रूरतों को समझना, उसके संकेतों को सुनना ही हमें स्वस्थ रहने में मदद करता है। अगर आप सिर्फ़ रोज़मर्रा की अकड़न या हल्की थकान महसूस कर रहे हैं, तो स्ट्रेचिंग एक बेहतरीन तरीका है अपनी मांसपेशियों को ढीला करने का। लेकिन अगर आपको कोई लगातार दर्द है, कोई चोट लगी है, या आप किसी सर्जरी से उबर रहे हैं, तो स्ट्रेचिंग के भरोसे न रहें। उस स्थिति में आपको एक विशेषज्ञ की मदद लेनी चाहिए जो आपको सही पुनर्वास कार्यक्रम बता सके। मैंने खुद यह सीखा है कि अपने शरीर का सम्मान करना और उसे सही समय पर सही चीज़ देना कितना ज़रूरी है।
फिटनेस के सफर में दोनों का महत्व
दोस्तों, फिटनेस कोई एक मंज़िल नहीं, बल्कि एक लगातार चलने वाला सफर है। और इस सफर में स्ट्रेचिंग और पुनर्वास व्यायाम, दोनों की अपनी-अपनी जगह और अपना-अपना महत्व है। स्वस्थ रहने के लिए, लचीलापन बनाए रखने के लिए स्ट्रेचिंग बहुत ज़रूरी है। यह हमें चोट लगने से बचाने में मदद करती है और हमारी दिनभर की गतिविधियों को आसान बनाती है। यह हमें अच्छा महसूस कराती है और तनाव कम करती है। दूसरी ओर, जब दुर्भाग्य से हमें चोट लग जाती है, तो पुनर्वास व्यायाम हमें उस स्थिति से बाहर निकालने और हमें फिर से पहले जैसा मज़बूत बनाने में मदद करते हैं। वे केवल ठीक ही नहीं करते, बल्कि हमें भविष्य के लिए और भी ज़्यादा तैयार करते हैं। तो, यह मत सोचिए कि एक दूसरे से बेहतर है। ये दोनों ही आपके स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण हैं, बस इन्हें सही समय पर और सही तरीके से इस्तेमाल करना आना चाहिए। अपने शरीर की सुनें, उसे समझें और उसे वह दें जिसकी उसे सबसे ज़्यादा ज़रूरत है।
मेरा अपना अनुभव: एक दोस्त की सच्ची सलाह
मैंने जो सीखा: शरीर और मन का तालमेल
मैं आपको अपना ही एक अनुभव बताती हूँ। कुछ साल पहले, मैंने जिम में ज़रूरत से ज़्यादा वज़न उठा लिया था और मेरी पीठ में हल्का खिंचाव आ गया। शुरू में, मैंने सोचा कि थोड़ी स्ट्रेचिंग कर लेती हूँ, सब ठीक हो जाएगा। पर दो दिन तक दर्द कम नहीं हुआ, बल्कि हल्की जकड़न महसूस होने लगी। तब मुझे एहसास हुआ कि यह सिर्फ़ अकड़न नहीं है, कुछ और है। मैंने एक अच्छे फिजियोथेरेपिस्ट से सलाह ली। उन्होंने मुझे कुछ विशिष्ट व्यायाम बताए जो मेरी कोर मांसपेशियों को मज़बूत करने के लिए थे। यह सीधे तौर पर स्ट्रेचिंग नहीं थी, बल्कि मेरी पीठ को सहारा देने वाली मांसपेशियों को प्रशिक्षित करने का काम था। मैंने लगभग तीन हफ्तों तक उनके बताए गए व्यायाम किए, और धीरे-धीरे मेरी पीठ का दर्द पूरी तरह ठीक हो गया। इस अनुभव ने मुझे सिखाया कि हमारा शरीर कितना समझदार है और वह हमें संकेत देता रहता है। हमें बस उन संकेतों को सही तरीके से समझना सीखना होगा। यह सिर्फ़ शारीरिक नहीं, बल्कि मानसिक संतुष्टि भी देता है जब आप अपने शरीर की बात सुनते हैं और सही निर्णय लेते हैं।
सही ज्ञान ही सच्ची शक्ति है
अगर आप मुझसे पूछें कि सबसे महत्वपूर्ण क्या है, तो मैं कहूँगी ‘सही जानकारी’। आज की दुनिया में, जहाँ हर कोई फटाफट समाधान चाहता है, यह समझना और भी ज़रूरी हो जाता है कि हर समस्या का एक ही हल नहीं होता। स्ट्रेचिंग और पुनर्वास व्यायाम दोनों ही हमारी फिटनेस यात्रा के महत्वपूर्ण हिस्से हैं, पर उनके उद्देश्य और उपयोग अलग-अलग हैं। मेरा ब्लॉग आपको हमेशा ऐसी ही सही और व्यावहारिक जानकारी देने की कोशिश करता है, ताकि आप अपने स्वास्थ्य के बारे में बेहतर निर्णय ले सकें। मुझे उम्मीद है कि आज की यह बातचीत आपको इन दोनों के बीच के अंतर को स्पष्ट रूप से समझने में मदद करेगी और आप अपने शरीर की ज़रूरतों के अनुसार सही चुनाव कर पाएंगे। याद रखिए, आपके शरीर का ख्याल रखना आपकी सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी है, और सही ज्ञान ही आपको इस ज़िम्मेदारी को निभाने में मदद करता है। तो, अपनी फिटनेस यात्रा में स्मार्ट बनें, अपने शरीर को जानें और स्वस्थ रहें!
दोस्तों, जैसा कि मैंने पहले बताया, फिट रहने की हमारी इच्छा तो बहुत होती है, पर कभी-कभी सही जानकारी न होने की वजह से हम कुछ गलतियाँ कर बैठते हैं। मैंने खुद देखा है, जिम में लोग अक्सर बिना ठीक से वार्म-अप किए ही भारी वज़न उठाना शुरू कर देते हैं, या फिर किसी हल्की-फुल्की चोट पर सिर्फ़ ‘स्ट्रेचिंग’ करके ही काम चलाने की कोशिश करते हैं। पर क्या आपको पता है कि शरीर की हर ज़रूरत अलग होती है?
कब आपको सिर्फ़ अपनी मांसपेशियों को ढीला करना है और कब उन्हें सच में ठीक करने की ज़रूरत है, ये जानना बहुत ज़रूरी है। आइए, इन दोनों चीज़ों को थोड़ा करीब से समझते हैं।
शरीर को समझो: उसे कब क्या चाहिए?
मांसपेशियों का लचीलापन और स्ट्रेचिंग का रिश्ता
जब हम स्ट्रेचिंग की बात करते हैं, तो मेरे दिमाग में सबसे पहले लचीलापन (flexibility) आता है। सोचिए, हम कितनी देर एक ही जगह बैठे रहते हैं या एक ही तरह का काम करते रहते हैं। इससे हमारी मांसपेशियाँ अकड़ जाती हैं, छोटी हो जाती हैं। मुझे याद है, एक बार मैं लगातार 8 घंटे तक कंप्यूटर पर काम कर रहा था, और शाम होते-होते मेरी गर्दन और कंधे ऐसे जाम हो गए थे जैसे किसी ने पत्थर रख दिया हो!
उस वक़्त मुझे बस कुछ हल्की स्ट्रेचिंग की ज़रूरत थी ताकि रक्त संचार ठीक हो सके और मांसपेशियाँ थोड़ी खुल सकें। स्ट्रेचिंग का मुख्य उद्देश्य यही होता है – मांसपेशियों की लंबाई बढ़ाना, जोड़ों की गति को बेहतर करना और शरीर को ज़्यादा फुर्तीला बनाना। यह हमें रोज़मर्रा के कामों को आसानी से करने में मदद करती है, जैसे झुकना, उठना या पहुँचने वाले काम। एक तरह से यह हमारे शरीर को ‘तैयार’ करती है, चाहे वह कसरत के लिए हो या सिर्फ़ दिनभर की गतिविधियों के लिए। लेकिन हाँ, इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि यह किसी गहरी चोट को ठीक कर सकती है। यह तो बस शरीर को थोड़ा आराम और गति देती है।
दर्द की असली वजह और पुनर्वास की भूमिका

अब बात करते हैं पुनर्वास व्यायाम (rehabilitation exercise) की। यह स्ट्रेचिंग से बिल्कुल अलग है। जब कभी हमें कोई चोट लगती है – चाहे वो खेल के दौरान हो, कोई मोच आ जाए या सर्जरी के बाद हो – तब सिर्फ़ स्ट्रेचिंग से काम नहीं चलता। हमें एक विशेष प्रकार के व्यायाम की ज़रूरत होती है जो उस चोट को ठीक करे, उस हिस्से की ताकत वापस लाए और भविष्य में वैसी चोट लगने की संभावना को कम करे। मेरा एक दोस्त था, जिसने क्रिकेट खेलते हुए अपने घुटने में चोट लगवा ली थी। डॉक्टर ने उसे फिजियोथेरेपिस्ट के पास जाने की सलाह दी। वहाँ उसने सिर्फ़ स्ट्रेचिंग नहीं की, बल्कि कुछ ख़ास तरह के व्यायाम किए जो उसके घुटने की मांसपेशियों को मज़बूत कर रहे थे, जोड़ को सहारा दे रहे थे और धीरे-धीरे उसे फिर से दौड़ने-भागने के लायक बना रहे थे। ये व्यायाम बहुत सोच-समझकर, धीरे-धीरे और किसी विशेषज्ञ की देखरेख में किए जाते हैं। उनका लक्ष्य होता है कि चोटग्रस्त हिस्से की कार्यक्षमता को पूरी तरह से बहाल किया जाए और व्यक्ति अपनी सामान्य दिनचर्या में वापस लौट सके।
जब चोट बोले: स्ट्रेचिंग की सीमाएँ
कब स्ट्रेचिंग आपकी दोस्त नहीं
दोस्तों, कभी-कभी हमें लगता है कि स्ट्रेचिंग हर दर्द का इलाज है, पर ऐसा नहीं है। मेरा अनुभव कहता है कि अगर आपको कोई तेज़ या लगातार दर्द हो रहा है, या कोई पुरानी चोट है जो ठीक नहीं हो रही, तो स्ट्रेचिंग से ज़्यादा आपको किसी और चीज़ की ज़रूरत है। मैंने देखा है कि लोग अक्सर पीठ दर्द में कुछ भी खींचने लगते हैं, जिससे कई बार दर्द और बढ़ जाता है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि दर्द का कारण सिर्फ़ मांसपेशियों का अकड़ना नहीं होता। हो सकता है कि कोई नस दबी हो, कोई जोड़ अपनी जगह से थोड़ा हट गया हो, या कोई लिगामेंट खिंच गया हो। ऐसी स्थिति में, अगर आप बिना सोचे-समझे स्ट्रेचिंग करते हैं, तो हो सकता है कि आप उस हिस्से पर और दबाव डाल रहे हों और चोट को और गंभीर बना रहे हों। स्ट्रेचिंग केवल मांसपेशियों को लंबा करती है, यह अंदरूनी क्षति को ठीक नहीं करती। अगर आप दर्द में स्ट्रेचिंग करते हैं और दर्द बढ़ जाता है, तो तुरंत रुक जाएँ। यह एक साफ़ संकेत है कि आपका शरीर आपको कुछ और करने के लिए कह रहा है।
सही समय पर सही कदम: विशेषज्ञ की सलाह
जब दर्द या चोट की बात आती है, तो मैं हमेशा यही कहती हूँ कि किसी विशेषज्ञ की सलाह लेना सबसे अच्छा है। एक फिजियोथेरेपिस्ट या डॉक्टर आपको बता सकते हैं कि आपकी चोट की असली वजह क्या है और उसके लिए सबसे सही इलाज क्या है। मुझे याद है, एक बार मेरे टखने में मोच आ गई थी, और मैंने सोचा कि थोड़ी स्ट्रेचिंग कर लूँगी तो ठीक हो जाएगा। पर जब दर्द नहीं गया, तो मैं डॉक्टर के पास गई। उन्होंने मुझे कुछ विशिष्ट पुनर्वास व्यायाम बताए और कहा कि अभी स्ट्रेचिंग से बचें। धीरे-धीरे उन व्यायामों को करके ही मैं पूरी तरह ठीक हो पाई। यह मेरा व्यक्तिगत अनुभव है कि जब शरीर में कुछ गड़बड़ लगे, तो ‘खुद ही डॉक्टर’ बनने की कोशिश न करें। खासकर जब बात चोट से उबरने की हो, तो सही मार्गदर्शन बहुत ज़रूरी है। विशेषज्ञ न केवल आपको सही व्यायाम सिखाते हैं, बल्कि यह भी बताते हैं कि उन्हें कितनी बार और कितने वज़न के साथ करना है, जो कि बहुत महत्वपूर्ण है।
पुनर्वास व्यायाम: वापसी का रास्ता
ताकत और संतुलन की बहाली
पुनर्वास व्यायाम सिर्फ़ दर्द कम करने के लिए नहीं होते, बल्कि वे आपको अपनी पूरी ताकत और गतिशीलता वापस दिलाने के लिए डिज़ाइन किए जाते हैं। कल्पना कीजिए, अगर आपके घुटने में चोट लगी है, तो पुनर्वास व्यायाम केवल घुटने पर ही काम नहीं करेंगे, बल्कि वे आस-पास की मांसपेशियों, जैसे कि जांघ और कूल्हे की मांसपेशियों को भी मज़बूत करेंगे। ऐसा इसलिए क्योंकि हमारे शरीर के अंग एक-दूसरे से जुड़े होते हैं। मैंने देखा है कि जब लोग पूरी तरह से पुनर्वास नहीं करते, तो उन्हें बार-बार वही चोट लगने का खतरा बना रहता है। पुनर्वास व्यायामों में अक्सर ताकत बनाने वाले व्यायाम (strength training), संतुलन वाले व्यायाम (balance exercises) और गतिशीलता वाले व्यायाम (mobility exercises) शामिल होते हैं। ये सभी मिलकर चोटग्रस्त हिस्से को पहले से भी ज़्यादा मज़बूत बनाते हैं। ये धीरे-धीरे शुरू होते हैं और जैसे-जैसे आपका शरीर ठीक होता जाता है, इनकी तीव्रता बढ़ती जाती है। यह एक धीमा लेकिन सुनिश्चित रास्ता है जो आपको पूरी तरह से ठीक होने में मदद करता है।
चोट से बचाव का कवच
क्या आप जानते हैं कि पुनर्वास व्यायाम सिर्फ़ चोट को ठीक ही नहीं करते, बल्कि भविष्य में वैसी ही चोट लगने से भी बचाते हैं? यह एक तरह से आपके शरीर के लिए ‘सुरक्षा कवच’ का काम करते हैं। जब कोई चोट लगती है, तो अक्सर ऐसा इसलिए होता है क्योंकि शरीर का कोई हिस्सा कमज़ोर होता है या संतुलन में कमी होती है। पुनर्वास के दौरान, हम उन कमज़ोरियों को दूर करते हैं और पूरे शरीर को एक साथ काम करने के लिए प्रशिक्षित करते हैं। मेरा एक और दोस्त है जो फुटबॉल खेलता है। उसे बार-बार हैमस्ट्रिंग (जांघ के पीछे की मांसपेशी) में खिंचाव आ जाता था। फिजियोथेरेपिस्ट ने उसे कुछ ख़ास पुनर्वास व्यायाम दिए जो न सिर्फ़ उसकी हैमस्ट्रिंग को मज़बूत कर रहे थे, बल्कि उसकी कूल्हे की मांसपेशियों और कोर (पेट और पीठ की मांसपेशियाँ) को भी ताकत दे रहे थे। इन व्यायामों से उसकी मांसपेशियों में समन्वय बेहतर हुआ और अब उसे सालों से वैसी चोट नहीं लगी है। यह एक बेहतरीन उदाहरण है कि कैसे पुनर्वास व्यायाम केवल ठीक करने के बजाय, बचाव का भी काम करते हैं।
स्ट्रेचिंग बनाम पुनर्वास: मुख्य अंतर एक नज़र में
दोस्तों, इन दोनों के बीच के अंतर को समझना बहुत ज़रूरी है ताकि आप अपने शरीर का सही तरीके से ख्याल रख सकें। मैंने आपके लिए एक छोटी सी तालिका बनाई है, जो आपको इनके मुख्य फ़र्कों को समझने में मदद करेगी। इसे देखकर आपको पता चलेगा कि कब आपको सिर्फ़ हल्का खिंचाव चाहिए और कब आपको एक गंभीर उपचार की ज़रूरत है।
| विशेषता | स्ट्रेचिंग (खिंचाव) | पुनर्वास व्यायाम (रिहैब) |
|---|---|---|
| मुख्य उद्देश्य | मांसपेशियों का लचीलापन बढ़ाना, गतिशीलता सुधारना, रक्त संचार बढ़ाना, अकड़न दूर करना। | चोट से उबरना, कार्यक्षमता बहाल करना, दर्द कम करना, ताकत और संतुलन बढ़ाना, भविष्य की चोटों को रोकना। |
| कब करें | सामान्य शारीरिक गतिविधि से पहले/बाद, दिनभर की अकड़न दूर करने के लिए, तनाव कम करने के लिए। | चोट लगने के बाद, सर्जरी के बाद, किसी चिकित्सीय स्थिति के इलाज के रूप में, डॉक्टर या फिजियोथेरेपिस्ट की सलाह पर। |
| तरीका | मांसपेशियों को धीरे-धीरे खींचना और एक निश्चित समय तक बनाए रखना (स्टेटिक स्ट्रेच), या गतिशील (डायनामिक) तरीके से खींचना। | विशिष्ट, लक्षित व्यायाम जो चोटग्रस्त हिस्से को मज़बूत और स्थिर करते हैं। अक्सर नियंत्रित, प्रगतिशील और दोहराव वाले होते हैं। |
| विशेषज्ञ की आवश्यकता | अक्सर स्वयं किया जा सकता है, पर सही तकनीक जानना फायदेमंद होता है। | लगभग हमेशा किसी योग्य फिजियोथेरेपिस्ट या चिकित्सा पेशेवर की देखरेख और मार्गदर्शन की आवश्यकता होती है। |
| जोखिम | गलत तरीके से करने पर मांसपेशियों में हल्का खिंचाव या चोट लग सकती है। | गलत तरीके से करने पर चोट बढ़ सकती है, या ठीक होने में देरी हो सकती है। विशेषज्ञ की देखरेख में करना बेहद ज़रूरी है। |
सही चुनाव: अपने शरीर का सम्मान करो
गलतफ़हमी से बचें, सही को चुनें
अब जब हमने स्ट्रेचिंग और पुनर्वास व्यायामों के बीच के अंतर को इतनी गहराई से समझा है, तो मुझे लगता है कि आप भी इस बात से सहमत होंगे कि इन दोनों को एक ही समझना कितनी बड़ी गलती हो सकती है। यह ऐसा ही है जैसे आप प्यास लगने पर खाना खा लें या भूख लगने पर पानी पी लें!
दोनों ही स्थिति में आपकी ज़रूरत पूरी नहीं होगी। मेरा मानना है कि अपने शरीर की ज़रूरतों को समझना, उसके संकेतों को सुनना ही हमें स्वस्थ रहने में मदद करता है। अगर आप सिर्फ़ रोज़मर्रा की अकड़न या हल्की थकान महसूस कर रहे हैं, तो स्ट्रेचिंग एक बेहतरीन तरीका है अपनी मांसपेशियों को ढीला करने का। लेकिन अगर आपको कोई लगातार दर्द है, कोई चोट लगी है, या आप किसी सर्जरी से उबर रहे हैं, तो स्ट्रेचिंग के भरोसे न रहें। उस स्थिति में आपको एक विशेषज्ञ की मदद लेनी चाहिए जो आपको सही पुनर्वास कार्यक्रम बता सके। मैंने खुद यह सीखा है कि अपने शरीर का सम्मान करना और उसे सही समय पर सही चीज़ देना कितना ज़रूरी है।
फिटनेस के सफर में दोनों का महत्व
दोस्तों, फिटनेस कोई एक मंज़िल नहीं, बल्कि एक लगातार चलने वाला सफर है। और इस सफर में स्ट्रेचिंग और पुनर्वास व्यायाम, दोनों की अपनी-अपनी जगह और अपना-अपना महत्व है। स्वस्थ रहने के लिए, लचीलापन बनाए रखने के लिए स्ट्रेचिंग बहुत ज़रूरी है। यह हमें चोट लगने से बचाने में मदद करती है और हमारी दिनभर की गतिविधियों को आसान बनाती है। यह हमें अच्छा महसूस कराती है और तनाव कम करती है। दूसरी ओर, जब दुर्भाग्य से हमें चोट लग जाती है, तो पुनर्वास व्यायाम हमें उस स्थिति से बाहर निकालने और हमें फिर से पहले जैसा मज़बूत बनाने में मदद करते हैं। वे केवल ठीक ही नहीं करते, बल्कि हमें भविष्य के लिए और भी ज़्यादा तैयार करते हैं। तो, यह मत सोचिए कि एक दूसरे से बेहतर है। ये दोनों ही आपके स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण हैं, बस इन्हें सही समय पर और सही तरीके से इस्तेमाल करना आना चाहिए। अपने शरीर की सुनें, उसे समझें और उसे वह दें जिसकी उसे सबसे ज़्यादा ज़रूरत है।
मेरा अपना अनुभव: एक दोस्त की सच्ची सलाह
मैंने जो सीखा: शरीर और मन का तालमेल
मैं आपको अपना ही एक अनुभव बताती हूँ। कुछ साल पहले, मैंने जिम में ज़रूरत से ज़्यादा वज़न उठा लिया था और मेरी पीठ में हल्का खिंचाव आ गया। शुरू में, मैंने सोचा कि थोड़ी स्ट्रेचिंग कर लेती हूँ, सब ठीक हो जाएगा। पर दो दिन तक दर्द कम नहीं हुआ, बल्कि हल्की जकड़न महसूस होने लगी। तब मुझे एहसास हुआ कि यह सिर्फ़ अकड़न नहीं है, कुछ और है। मैंने एक अच्छे फिजियोथेरेपिस्ट से सलाह ली। उन्होंने मुझे कुछ विशिष्ट व्यायाम बताए जो मेरी कोर मांसपेशियों को मज़बूत करने के लिए थे। यह सीधे तौर पर स्ट्रेचिंग नहीं थी, बल्कि मेरी पीठ को सहारा देने वाली मांसपेशियों को प्रशिक्षित करने का काम था। मैंने लगभग तीन हफ्तों तक उनके बताए गए व्यायाम किए, और धीरे-धीरे मेरी पीठ का दर्द पूरी तरह ठीक हो गया। इस अनुभव ने मुझे सिखाया कि हमारा शरीर कितना समझदार है और वह हमें संकेत देता रहता है। हमें बस उन संकेतों को सही तरीके से समझना सीखना होगा। यह सिर्फ़ शारीरिक नहीं, बल्कि मानसिक संतुष्टि भी देता है जब आप अपने शरीर की बात सुनते हैं और सही निर्णय लेते हैं।
सही ज्ञान ही सच्ची शक्ति है
अगर आप मुझसे पूछें कि सबसे महत्वपूर्ण क्या है, तो मैं कहूँगी ‘सही जानकारी’। आज की दुनिया में, जहाँ हर कोई फटाफट समाधान चाहता है, यह समझना और भी ज़रूरी हो जाता है कि हर समस्या का एक ही हल नहीं होता। स्ट्रेचिंग और पुनर्वास व्यायाम दोनों ही हमारी फिटनेस यात्रा के महत्वपूर्ण हिस्से हैं, पर उनके उद्देश्य और उपयोग अलग-अलग हैं। मेरा ब्लॉग आपको हमेशा ऐसी ही सही और व्यावहारिक जानकारी देने की कोशिश करता है, ताकि आप अपने स्वास्थ्य के बारे में बेहतर निर्णय ले सकें। मुझे उम्मीद है कि आज की यह बातचीत आपको इन दोनों के बीच के अंतर को स्पष्ट रूप से समझने में मदद करेगी और आप अपने शरीर की ज़रूरतों के अनुसार सही चुनाव कर पाएंगे। याद रखिए, आपके शरीर का ख्याल रखना आपकी सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी है, और सही ज्ञान ही आपको इस ज़िम्मेदारी को निभाने में मदद करता है। तो, अपनी फिटनेस यात्रा में स्मार्ट बनें, अपने शरीर को जानें और स्वस्थ रहें!
글을마치며
तो दोस्तों, आखिर में मैं बस यही कहना चाहूंगी कि अपने शरीर को समझना और उसकी ज़रूरतों को पहचानना ही सबसे बड़ी समझदारी है। स्ट्रेचिंग और पुनर्वास दोनों ही आपकी सेहत के लिए ज़रूरी हैं, पर इनका सही समय और सही उपयोग जानना बेहद अहम है। मैंने खुद अपने अनुभव से सीखा है कि कभी-कभी हमें लगता है कि हम सब जानते हैं, पर असल में विशेषज्ञ की राय ही हमें सही रास्ते पर ले जाती है। अपने शरीर के संकेतों को सुनें और उसे वह दें जिसकी उसे सच में ज़रूरत है, ताकि आप एक स्वस्थ और खुशहाल जीवन जी सकें।
알아두면 쓸모 있는 정보
1. हमेशा अपने वर्कआउट से पहले हल्का वार्म-अप और बाद में कूल-डाउन स्ट्रेचिंग ज़रूर करें। यह मांसपेशियों को लचीला बनाए रखने और चोटों से बचाने में मदद करता है।
2. अगर आपको कोई तेज़ या लगातार दर्द महसूस हो, तो उसे सिर्फ़ स्ट्रेचिंग से ठीक करने की कोशिश न करें। यह किसी अंदरूनी चोट का संकेत हो सकता है जिसके लिए मेडिकल सलाह ज़रूरी है।
3. चोट लगने या सर्जरी के बाद, किसी योग्य फिजियोथेरेपिस्ट की सलाह ज़रूर लें। वे आपके लिए एक विशेष पुनर्वास योजना तैयार करेंगे जो आपको पूरी तरह से ठीक होने में मदद करेगी।
4. अपने शरीर को हाइड्रेटेड रखें और संतुलित आहार लें, क्योंकि यह मांसपेशियों के स्वास्थ्य और रिकवरी के लिए बहुत ज़रूरी है।
5. अपनी दिनचर्या में सक्रिय रहें। नियमित शारीरिक गतिविधि, चाहे वह हल्की स्ट्रेचिंग हो या चलना, आपके शरीर को स्वस्थ और ऊर्जावान बनाए रखने में मदद करती है।
중요 사항 정리
आज की इस बातचीत में हमने जाना कि स्ट्रेचिंग और पुनर्वास व्यायाम के बीच क्या बुनियादी अंतर हैं। स्ट्रेचिंग मुख्य रूप से मांसपेशियों के लचीलेपन और गतिशीलता को बढ़ाने के लिए है, जबकि पुनर्वास व्यायाम चोटों से उबरने, ताकत बहाल करने और भविष्य में चोटों से बचाव के लिए होते हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि किसी भी दर्द या चोट की स्थिति में, स्वयं उपचार करने के बजाय हमेशा किसी चिकित्सा पेशेवर, जैसे कि फिजियोथेरेपिस्ट या डॉक्टर की सलाह लेनी चाहिए। सही समय पर सही कदम उठाना ही आपके स्वास्थ्य और दीर्घकालिक फिटनेस के लिए सबसे अच्छा है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ) 📖
प्र: स्ट्रेचिंग और रिहैबिलिटेशन एक्सरसाइज में मुख्य अंतर क्या है?
उ: अरे वाह, ये तो बहुत ही अहम सवाल है! मेरे अनुभव में, स्ट्रेचिंग और रिहैबिलिटेशन एक्सरसाइज दोनों ही हमारे शरीर के लिए बहुत फायदेमंद हैं, लेकिन इनके मकसद बिल्कुल अलग होते हैं। इसे ऐसे समझो – स्ट्रेचिंग (यानी खिंचाव वाले व्यायाम) हम आमतौर पर अपनी मांसपेशियों को लचीला बनाने, उनकी रेंज ऑफ मोशन (गति की सीमा) बढ़ाने और हल्के तनाव को कम करने के लिए करते हैं। जैसे, सुबह उठकर या वर्कआउट से पहले-बाद में हम थोड़ी स्ट्रेचिंग कर लेते हैं ताकि मांसपेशियां खुल जाएं और चोट का खतरा कम हो। मैंने खुद महसूस किया है कि नियमित स्ट्रेचिंग से शरीर में ताजगी और हल्कापन आता है।
वहीं, रिहैबिलिटेशन एक्सरसाइज (यानी पुनर्वास व्यायाम) का काम इससे कहीं ज़्यादा गहरा होता है। ये तब की जाती हैं जब आपको कोई चोट लगी हो, सर्जरी हुई हो, या शरीर के किसी हिस्से में लगातार दर्द हो रहा हो। इनका मुख्य उद्देश्य चोट से उबरना, प्रभावित क्षेत्र की ताकत, स्थिरता और कार्यक्षमता को वापस लाना होता है। ये केवल मांसपेशियों को खींचना नहीं है, बल्कि इनमें खास तरह के व्यायाम शामिल होते हैं जो उस खास चोट या समस्या को ठीक करने पर केंद्रित होते हैं। इसमें संतुलन बनाने वाले व्यायाम, ताकत बढ़ाने वाले और धीरे-धीरे शरीर को उसकी सामान्य अवस्था में लाने वाले अभ्यास शामिल होते हैं। एक बार मेरे घुटने में हल्की मोच आ गई थी, तब मुझे एक फिजियोथेरेपिस्ट ने कुछ खास रिहैबिलिटेशन एक्सरसाइज बताई थीं, जिनसे मुझे बहुत फायदा हुआ और मेरा घुटना पहले जैसा मजबूत हो गया। तो, स्ट्रेचिंग एक सामान्य देखभाल है, जबकि रिहैबिलिटेशन एक खास इलाज का हिस्सा है।
प्र: क्या मैं घर पर ही अपनी स्ट्रेचिंग या रिहैबिलिटेशन एक्सरसाइज कर सकता हूँ, या किसी विशेषज्ञ की मदद लेना ज़रूरी है?
उ: दोस्तों, ये सवाल मुझे बहुत सुनने को मिलता है! सच कहूँ तो, हल्की-फुल्की स्ट्रेचिंग जो आप अपनी दिनचर्या में शामिल करते हैं, जैसे सुबह उठकर या काम के बीच में शरीर को हल्का-फुल्का खींचना, वो आप खुद घर पर कर सकते हैं। इसके लिए आप ऑनलाइन मौजूद बहुत से भरोसेमंद वीडियोज़ या ऐप्स की मदद ले सकते हैं। लेकिन हाँ, ध्यान रहे कि सही तरीका पता होना चाहिए ताकि मांसपेशियों को नुकसान न पहुँचे। मैंने खुद भी कई बार स्ट्रेचिंग के गलत तरीके अपनाकर थोड़ी असहजता महसूस की है, इसलिए सही जानकारी बहुत ज़रूरी है।
पर जब बात रिहैबिलिटेशन की आती है, तो मेरी आपको ये सलाह है कि किसी योग्य विशेषज्ञ, जैसे फिजियोथेरेपिस्ट या स्पोर्ट्स मेडिसिन डॉक्टर की मदद लेना बहुत ही ज़रूरी है। रिहैबिलिटेशन एक्सरसाइज इतनी खास होती हैं कि आपकी चोट, उम्र और शारीरिक स्थिति के हिसाब से इन्हें डिज़ाइन किया जाता है। गलत एक्सरसाइज करने से चोट और बिगड़ सकती है, और फायदे की जगह नुकसान हो सकता है। जब मुझे मोच आई थी, तब मैंने भी सोचा था कि कुछ भी कर लूं, पर डॉक्टर ने मुझे समझाया कि हर चोट के लिए अलग तरह के व्यायाम होते हैं और उनका मार्गदर्शन ही सबसे अच्छा है। वे आपको सही तकनीक सिखाते हैं, आपकी प्रगति की निगरानी करते हैं और ज़रूरत पड़ने पर व्यायाम में बदलाव भी करते हैं। तो, अगर आपको कोई दर्द या चोट है, तो खुद डॉक्टर बनने की कोशिश न करें, बल्कि विशेषज्ञ के पास जाएँ।
प्र: स्ट्रेचिंग या रिहैबिलिटेशन से मुझे क्या-क्या फायदे मिल सकते हैं और क्या कोई जोखिम भी है?
उ: ये जानना बहुत ज़रूरी है कि हमें इन दोनों से क्या उम्मीद रखनी चाहिए! स्ट्रेचिंग के फायदों की तो लिस्ट लंबी है – इससे आपकी मांसपेशियां लचीली बनती हैं, जॉइंट्स (जोड़ों) की गतिशीलता बढ़ती है, रक्त संचार सुधरता है और वर्कआउट के बाद मांसपेशियों की अकड़न कम होती है। मैंने देखा है कि जो लोग नियमित स्ट्रेचिंग करते हैं, वे ज़्यादा एक्टिव और तनावमुक्त महसूस करते हैं। यह चोटों के खतरे को भी कुछ हद तक कम कर सकती है, खासकर अचानक होने वाले खिंचाव से। लेकिन हाँ, अगर गलत तरीके से या ज़्यादा ज़ोर से स्ट्रेचिंग की जाए, तो मांसपेशियों में खिंचाव आ सकता है या मोच भी आ सकती है।
वहीं, रिहैबिलिटेशन एक्सरसाइज के फायदे तो चोट या बीमारी से उबरने के लिए अनमोल हैं। ये आपको दर्द से राहत दिलाती हैं, मांसपेशियों की खोई हुई ताकत और कार्यक्षमता को वापस लाती हैं, संतुलन और कोऑर्डिनेशन (तालमेल) को बेहतर बनाती हैं, और सबसे बढ़कर, आपको अपनी रोज़मर्रा की गतिविधियों को बिना दर्द के करने में सक्षम बनाती हैं। मेरे एक दोस्त को कंधे की चोट थी और रिहैब से वो फिर से अपना पसंदीदा खेल खेल पा रहा है!
इससे भविष्य में वैसी ही चोट लगने की संभावना भी कम होती है। जोखिम की बात करें तो, अगर रिहैबिलिटेशन एक्सरसाइज किसी विशेषज्ञ की देखरेख में न की जाए, तो इससे चोट और बढ़ सकती है, या रिकवरी धीमी हो सकती है। इसलिए, सही मार्गदर्शन में ही ये अभ्यास करने चाहिए ताकि आपको ज़्यादा से ज़्यादा फायदा मिल सके और किसी भी तरह का जोखिम न हो।





